धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत कैसे किया जाता है? कृपया विस्तार से बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम अजा एकादशी है। यह व्रत अत्यंत पुण्यदायक है और मनुष्य को समस्त पापों से मुक्त करने वाला है। इसके प्रभाव से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अजा एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में चंपावती नाम की नगरी में हरिश्चंद्र नाम का एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। वह सत्यवादी और दानवीर था, किंतु अपने कर्मों के कारण उसे अत्यंत कष्ट भोगना पड़ा। वह राज्य, पत्नी और पुत्र से वंचित हो गया और अंत में श्मशान में चांडाल की सेवा करने लगा। शोक और दुख से पीड़ित राजा ने एक दिन महर्षि गौतम के उपदेश से अजा एकादशी का व्रत किया।
राजा हरिश्चंद्र ने पूर्ण श्रद्धा से इस एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की आराधना की। इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसके जीवन के कष्ट समाप्त हो गए। उसे पुनः राज्य, पत्नी और पुत्र की प्राप्ति हुई और अंत में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, अजा एकादशी का व्रत इतना प्रभावशाली है कि यह दरिद्रता, शोक और पापों का पूर्ण नाश कर देता है।
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अजा एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थान को पवित्र कर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करना चाहिए और दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित कर श्रद्धा से धूप-दीप दिखाना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र या अजा एकादशी की कथा का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से संयम रखते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक अजा एकादशी का व्रत करता है, वह सभी दुखों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
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