धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे माधव, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत किस प्रकार किया जाता है? तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम आमलकी एकादशी है। यह एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और आंवले के वृक्ष से विशेष रूप से जुड़ी हुई है। इस व्रत को करने से मनुष्य को आरोग्य, दीर्घायु, पापों से मुक्ति और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने आमलकी एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में वैदिश नामक एक नगर था, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णों के लोग धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे। उस नगर के निवासी भगवान विष्णु के परम भक्त थे और एकादशी व्रत का पालन करते थे। नगर के समीप एक विशाल आंवले का वृक्ष था, जिसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता था।
एक बार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन नगरवासियों ने उस आंवले के वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की पूजा की और रात्रि जागरण किया। उस पूजा और व्रत के प्रभाव से नगर के सभी लोगों के पाप नष्ट हो गए और उन्हें विष्णु लोक की प्राप्ति हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इसी कारण यह एकादशी आमलकी एकादशी कहलाती है और आंवले का पूजन विशेष फलदायी माना गया है।
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने आमलकी एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। यदि संभव हो तो आंवले के वृक्ष के समीप जाकर पूजा करनी चाहिए, अन्यथा घर में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित कर पूजन करना चाहिए।
भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए तथा आंवले के फल या पत्ते अर्पित करना विशेष पुण्यदायक माना गया है। श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम या आमलकी एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से संयम रखते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देनी चाहिए तथा आंवले का दान करना भी उत्तम माना गया है। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह स्वस्थ, दीर्घायु और पापमुक्त होकर अंत में भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
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