धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत कैसे किया जाता है? कृपया विस्तार से बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम इन्दिरा एकादशी है। यह व्रत विशेष रूप से पितरों के उद्धार के लिए किया जाता है। जो मनुष्य श्रद्धा से इस एकादशी का व्रत करता है, उसके पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं और व्रत करने वाले को भी महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने इन्दिरा एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में महिष्मती नगरी में इन्द्रसेन नाम का एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। एक दिन राजा ने स्वप्न में अपने पितरों को दुखी अवस्था में देखा। स्वप्न से व्याकुल होकर उसने ऋषियों से इसका कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि उसके पिता ने अपने जीवन में एकादशी का पालन नहीं किया था, जिसके कारण वे नरक में पड़े हैं। ऋषियों के उपदेश से राजा इन्द्रसेन ने आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया।
राजा इन्द्रसेन के इस व्रत के प्रभाव से उसके पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्ग लोक चले गए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इसी कारण यह एकादशी पितृ उद्धार के लिए अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। इस व्रत के प्रभाव से कुल की शुद्धि होती है और पितृ दोष का नाश होता है।
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने इन्दिरा एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थान को पवित्र कर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए। श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम या इन्दिरा एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से शुद्ध रहकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करना विशेष पुण्यदायक माना गया है।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पितरों के निमित्त तर्पण और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देनी चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक इन्दिरा एकादशी का व्रत करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और वह स्वयं भी भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
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