देवशयनी एकादशी ( आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष)

देवशयनी एकादशी ( आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है, इसे देवशयनी एकादशी क्यों कहा जाता है और इसका व्रत कैसे किया जाता है? तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, यह एकादशी देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहलाती है। इसी दिन से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीनों तक देव निद्रा में रहते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो देवउठनी एकादशी तक रहता है।

श्रीकृष्ण ने कहा कि देवशयनी एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायक है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त पापों का नाश होता है और मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल में अनेक राजाओं और ऋषियों ने इस व्रत के प्रभाव से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त की थी। जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से व्रत करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और धर्म की वृद्धि होती है।

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि इस एकादशी से चातुर्मास का आरंभ होता है, इसलिए इस समय संयम, तप और नियम का विशेष महत्व होता है। इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते और साधक भक्ति, जप तथा सेवा में प्रवृत्त रहते हैं। देवशयनी एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति भगवान विष्णु का प्रिय बन जाता है।

इसके पश्चात श्रीकृष्ण ने पूजन विधि का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। मन में व्रत का संकल्प लेकर स्वच्छ स्थान पर भगवान विष्णु या शेषशायी भगवान की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करना चाहिए। दीप प्रज्वलित कर गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए।

श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र या देवशयनी एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और हरिनाम स्मरण करते हुए संयम का पालन करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इस दिन से चातुर्मास के नियमों का पालन आरंभ किया जाता है।

द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत करता है, वह भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करता है और अंत में वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।

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