धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे मधुसूदन, वर्ष में अनेक एकादशियाँ आती हैं, परंतु मैं सभी एकादशियों का विधिपूर्वक पालन नहीं कर पाता। विशेष रूप से भीमसेन तो एक दिन भी बिना भोजन के नहीं रह सकते। ऐसी स्थिति में कोई एक ऐसा व्रत बताइए जिससे समस्त एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए। युधिष्ठिर की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले—हे राजन, तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। तुम्हारे भ्राता भीम के लिए निर्जला एकादशी का व्रत ही सर्वश्रेष्ठ है।
श्रीकृष्ण ने कहा—ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की यह एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत का पालन महाबली भीमसेन ने स्वयं किया था, इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। भीमसेन ने मुझसे कहा था कि वे भूख सहन नहीं कर सकते, परंतु सभी एकादशियों का पुण्य पाना चाहते हैं। तब मैंने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत बताया, जिसमें जल तक का त्याग किया जाता है। इस एक व्रत के प्रभाव से वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि प्राचीन काल में देवर्षि नारद ने भी इस व्रत की महिमा का वर्णन किया था। निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत कठिन होते हुए भी सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जो व्यक्ति इस दिन बिना अन्न और बिना जल के व्रत करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु के समय यमदूत उसके पास नहीं आते, बल्कि भगवान विष्णु के पार्षद उसे वैकुण्ठ लोक ले जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को दीर्घायु, आरोग्य, यश और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को निर्जला एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर मन और शरीर को शुद्ध करना चाहिए। इसके पश्चात भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए कि आज के दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाएगा। स्वच्छ स्थान पर पीले वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करना चाहिए और दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
श्रद्धा के साथ भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए। धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या निर्जला एकादशी की कथा का श्रवण करना चाहिए। दिन भर इंद्रियों पर पूर्ण संयम रखते हुए भगवान का नाम स्मरण करना चाहिए। इस व्रत में क्रोध, झूठ, निंदा और अहंकार का त्याग अत्यंत आवश्यक माना गया है। रात्रि में जागरण करके भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करनी चाहिए। इस दिन जल से भरा कलश, पंखा, छाता, वस्त्र या घड़ा दान करना विशेष पुण्यदायक माना गया है क्योंकि यह एकादशी ग्रीष्म ऋतु में आती है। ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं जल और सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।
अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त एकादशियों का फल प्राप्त करता है। उसके जीवन के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं और अंत में वह भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
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