पापांकुशा एकादशी (आश्विन मास शुक्ल पक्ष)

पापांकुशा एकादशी (आश्विन मास शुक्ल पक्ष)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत किस प्रकार किया जाता है? कृपया विस्तार से बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और मनुष्य को भक्ति मार्ग पर अग्रसर करने वाली है। इसके व्रत से व्यक्ति के जीवन में संचित पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे अंकुश से मदमस्त हाथी नियंत्रित हो जाता है, इसी कारण इसे पापांकुशा कहा गया है।

भगवान श्रीकृष्ण ने इस एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में क्रौंच नाम का एक अत्यंत दुराचारी शिकारी रहता था। वह हिंसा, मद्यपान और अधर्म में लिप्त रहता था। एक बार वह शिकार करते-करते वन में भटक गया और भूख-प्यास से व्याकुल होकर एक ऋषि के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने करुणा करके उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया। शिकारी ने श्रद्धा से इस व्रत का पालन किया।

इस एकादशी के प्रभाव से उस शिकारी के समस्त पाप नष्ट हो गए और उसका हृदय निर्मल हो गया। उसने हिंसा और अधर्म का त्याग कर दिया और अंत में भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष को प्राप्त हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इस प्रकार पापांकुशा एकादशी मनुष्य को पापों से मुक्त कर धर्म और भक्ति के मार्ग पर ले आती है।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने पापांकुशा एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्वच्छ स्थान पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए। श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम या पापांकुशा एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से संयम रखते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।

द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक पापांकुशा एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।

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