मोक्षदा एकादशी (मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्ष)

मोक्षदा एकादशी (मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्ष)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे केशव, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत करने से मनुष्य को कौन सा फल प्राप्त होता है? तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम मोक्षदा एकादशी है। यह एकादशी जीवों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसके व्रत से मनुष्य न केवल अपने पापों से मुक्त होता है, बल्कि अपने पूर्वजों को भी सद्गति प्रदान कर सकता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने मोक्षदा एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में वैखानस नामक एक सुंदर नगरी थी, जहाँ राजा सुकृतवर्मा राज्य करता था। वह धर्मप्रिय और प्रजावत्सल था। एक दिन राजा ने स्वप्न में अपने पिता को अत्यंत कष्ट में देखा। स्वप्न से व्याकुल होकर राजा ने महर्षियों से इसका कारण पूछा। ऋषियों ने बताया कि राजा के पिता ने पूर्व जन्म में एक ब्राह्मण की हत्या की थी, जिसके कारण उन्हें प्रेत योनि प्राप्त हुई है।

ऋषियों के उपदेश से राजा सुकृतवर्मा ने मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत किया। उन्होंने पूरे नियम और भक्ति भाव से भगवान विष्णु की आराधना की। इस व्रत के प्रभाव से राजा के पिता प्रेत योनि से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इसी कारण यह एकादशी मोक्ष प्रदान करने वाली कही जाती है।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने मोक्षदा एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्वच्छ स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए। श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र या मोक्षदा एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से संयम रखते हुए भगवान का ध्यान करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा देनी चाहिए और गरीबों को अन्न-वस्त्र दान करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है, वह अपने और अपने कुल के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है और अंत में भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।

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