योगिनी एकादशी (आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष)

योगिनी एकादशी (आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत कैसे किया जाता है? कृपया विस्तार से बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। यह व्रत समस्त पापों को नष्ट करने वाला और रोग, शोक तथा दरिद्रता से मुक्ति दिलाने वाला है। इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को महान पुण्य की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने योगिनी एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में अलकापुरी नगरी में कुबेर का शासन था। उनके यहाँ हेममाली नाम का एक यक्ष पुष्प लाने का कार्य करता था। वह प्रतिदिन मानसरोवर से पुष्प लाकर भगवान शिव की पूजा में अर्पित करता था। एक दिन वह अपनी पत्नी के मोह में फँस गया और पुष्प लाना भूल गया। इससे कुबेर क्रोधित हो गए और उन्होंने हेममाली को कोढ़ी होने का शाप दे दिया। शाप के कारण वह भयंकर रोग से पीड़ित होकर वन में भटकने लगा।

बहुत समय बाद पीड़ा सहते हुए वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने करुणा करके उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। हेममाली ने श्रद्धा से इस व्रत का पालन किया। योगिनी एकादशी के प्रभाव से उसका कोढ़ रोग नष्ट हो गया और वह पुनः अपने यक्ष स्वरूप में लौट आया। उसे कुबेर की कृपा भी प्राप्त हुई। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने बताया कि यह एकादशी कितनी प्रभावशाली और पाप नाशिनी है।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि करके शरीर और मन को शुद्ध करना चाहिए। स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा स्थान को पवित्र करके भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करना चाहिए। दीप प्रज्वलित कर गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए।

श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम या योगिनी एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर उपवास रखते हुए अन्न का त्याग करना चाहिए और हरिनाम का स्मरण करना चाहिए। जो निर्जल व्रत न कर सकें, वे फलाहार कर सकते हैं। रात्रि में जागरण करके भजन, कीर्तन और भगवान विष्णु का नाम जप करना विशेष पुण्यदायक माना गया है।

द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत करता है, वह रोग, पाप और दुखों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।

0 comments

Leave a comment