रमा एकादशी (कार्तिक मास कृष्ण पक्ष)

रमा एकादशी (कार्तिक मास कृष्ण पक्ष)

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत किस प्रकार किया जाता है? कृपया विस्तार से बताइए। तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम रमा एकादशी है। यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायिनी है और मनुष्य को समस्त पापों से मुक्त करने वाली है। इसके व्रत से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने रमा एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में मुचुकुन्द नाम का एक प्रसिद्ध राजा था। वह सत्यवादी, दानी और धर्मपरायण था। एक बार अपने पूर्व जन्म के किसी दोष के कारण उसे दरिद्रता और कष्ट का सामना करना पड़ा। राजा और उसकी पत्नी दोनों ही अत्यंत दुखी रहने लगे। एक दिन उन्होंने ऋषियों के उपदेश से कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का व्रत किया।

राजा मुचुकुन्द और उसकी पत्नी ने पूरे श्रद्धा भाव से इस व्रत का पालन किया। उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की, उपवास रखा और रात्रि में जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके जीवन के सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें पुनः वैभव, सुख और यश की प्राप्ति हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इसी कारण रमा एकादशी को धन, समृद्धि और पाप नाश करने वाली एकादशी कहा गया है।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने रमा एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्वच्छ स्थान पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

भगवान को गंगाजल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित कर श्रद्धा से धूप-दीप दिखाना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र या रमा एकादशी की कथा का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से संयम रखते हुए भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर भजन, कीर्तन और हरिनाम संकीर्तन करने से व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक रमा एकादशी का व्रत करता है, वह इस लोक में सुख-समृद्धि और अंत में भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।

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