वरूथिनी एकादशी व्रत कथा एवं पूजन विधि
(श्रीकृष्ण–युधिष्ठिर संवाद के अनुसार)
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदनपूर्वक पूछा—
“हे सर्वशक्तिमान! कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी का क्या महत्व है? इसके व्रत का कारण क्या है और इसे किस प्रकार से करना चाहिए? कृपया अपनी दिव्य दृष्टि से इसकी पूरी कथा और पूजन विधि बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “हे राजन्! वरूथिनी एकादशी अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक व्रत है। यह व्रत मनुष्य के जीवन से पाप और दुखों का नाश करने वाला है। अब मैं तुम्हें इस व्रत की कथा विस्तार से बताता हूँ।”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि प्राचीन काल में सागर के किनारे स्थित एक नगर में एक ब्राह्मण कुलवंत नामक युवक रहता था। वह अत्यंत धर्मपरायण और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान था। कुलवंत ब्राह्मण अपने घर में धर्मपूर्वक कर्म करता, ऋषियों की सेवा करता और ईश्वर की भक्ति में लीन रहता। परंतु एक बार उसने अपनी व्यस्तता और लालच के कारण अपने धर्म और व्रत का पालन नहीं किया। इससे उसकी मन:स्थिति में अशांति और पाप उत्पन्न हो गए।
कुलवंत ब्राह्मण अपने पापों से घबराया और उसने भगवान विष्णु की शरण ली। तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने उसे वरूथिनी एकादशी के व्रत करने का उपदेश दिया। भगवान ने कहा कि जो व्यक्ति वरूथिनी एकादशी का पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से व्रत करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, परिवार में सुख और समृद्धि आती है, और उसके घर में संतानों का कल्याण होता है। इस व्रत का पुण्य अन्य किसी व्रत या तपस्या से तुलना नहीं किया जा सकता।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि वरूथिनी एकादशी केवल व्रत करने का नाम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के हृदय और मन की अशुद्धियों को दूर करने वाला साधन है। जो मनुष्य इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति से करता है, वह अपने जीवन में मानसिक शांति, आत्मिक पवित्रता और भौतिक सुखों की प्राप्ति करता है।
अब मैं तुम्हें इसके पूजन और व्रत की विधि बताता हूँ। इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही करनी चाहिए। दशमी के दिन भोजन सात्विक और संयमित होना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
पूजन स्थल को साफ कर प्रतिमा या चित्र की स्थापना करनी चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी पत्र, पुष्प, दीप, धूप और पंचामृत अर्पित करना चाहिए। इस दिन अनाज का सेवन पूर्णतः वर्जित है। फलाहार या निर्जला व्रत श्रेष्ठ माना गया है।
पूजन के दौरान भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम का पाठ और वरूथिनी एकादशी कथा का श्रवण व्रत को पूर्ण पुण्य प्रदान करता है। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन और ध्यान करना चाहिए।
द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण करना चाहिए। सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों और गरीबों को दान और भोजन देना अत्यंत फलदायी है। ऐसा करने से व्रत का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है और जीवन में समृद्धि, शांति और सुख की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि कथा सुनने और पढ़ने का भी विशेष महत्व है। जो व्यक्ति स्वयं व्रत करने में असमर्थ होता है, यदि वह भी इस कथा को श्रद्धा और भक्ति भाव से पढ़े या सुने, उसे व्रत के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। कथा का श्रवण और पाठ मन को पवित्र करता है, भय और चिंता को दूर करता है, और व्यक्ति भगवान विष्णु की कृपा से धर्म और भक्ति मार्ग पर स्थिर रहता है।
इस प्रकार वरूथिनी एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, भक्ति और मोक्ष प्राप्ति का दिव्य साधन है। जो भी व्यक्ति इसे विधिपूर्वक करता है या इसकी कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है।
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