धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—हे जनार्दन, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी महिमा क्या है और इसका व्रत किस प्रकार किया जाता है? तब भगवान श्रीकृष्ण बोले—हे राजन, इस एकादशी का नाम षटतिला एकादशी है। यह एकादशी विशेष रूप से तिल से किए गए दान, स्नान और पूजन के कारण प्रसिद्ध है। इसके व्रत से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं और उसे यम लोक के भय से मुक्ति मिलती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने षटतिला एकादशी की कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीन काल में एक ब्राह्मण रहता था, जो बाहरी रूप से धार्मिक था, परंतु दान-पुण्य से विमुख था। मृत्यु के पश्चात उसे यम लोक ले जाया गया। वहाँ यमराज ने बताया कि उसने जीवन में दान नहीं किया था, इसलिए उसे कष्ट भोगने होंगे। ब्राह्मण ने यमराज से विनती की। तब उसे पुनः पृथ्वी पर भेजा गया और षटतिला एकादशी का व्रत करने का अवसर दिया गया।
उस ब्राह्मण ने माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी को श्रद्धा से तिल का दान किया, तिल से स्नान किया और भगवान विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए और उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, इस प्रकार षटतिला एकादशी पापों का नाश कर मोक्ष प्रदान करने वाली है।
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने षटतिला एकादशी की पूजन विधि बताई। उन्होंने कहा कि माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। स्नान जल में तिल मिलाना विशेष पुण्यदायक माना गया है। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए और स्वच्छ स्थान पर उनकी मूर्ति या चित्र स्थापित कर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
भगवान को तिल मिश्रित जल, चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी दल अर्पित करने चाहिए। श्रद्धा से धूप-दीप दिखाकर विष्णु सहस्रनाम या षटतिला एकादशी की कथा का पाठ करना चाहिए। दिन भर अन्न का त्याग कर उपवास रखना चाहिए और तिल से बने पदार्थों का दान करना चाहिए। रात्रि में जागरण कर हरिनाम स्मरण करना विशेष फलदायी माना गया है।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मणों को तिल, वस्त्र और दक्षिणा का दान देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इसके पश्चात स्वयं सात्त्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक षटतिला एकादशी का व्रत करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परमधाम को प्राप्त करता है।
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